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Definitional Dictionary of Surgical Terms (English-Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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Basophil Adenoma

क्षाररागी ग्रन्थि अर्बुद
पीयूषिका ग्रन्थि की क्षाररागी कोशिकाओं से बना एक छोटा दर्दम अर्बुद जिसके कारण कॉर्टेसोन अधिक पैदा होता है। इसका इलाज शस्त्रकर्म है।

Bassini’S Operation

बैसिनी शस्त्रकर्म
यह विरोहण (healing) की प्रतिष्ठित पद्धति है, जिसे हार्निया के रोगियों में किया जाता है जिसमें संयुक्त कंडरा (conjoined tendon) का सीवन वृषण रज्जु (spermatic cord) के पीछे वक्षण स्नायु (inguinal ligament) के साथ कर दिया जाता है। इस प्रकार का सीवन वक्षण नलिका (inguinal canal) की पश्च मिति (posterior wall) को मजबूत करने के लिए किया जाता है।

Bayonet Leg

जंघास्थिस्थान-च्युति-जन्य जानुसन्धि-ग्रह
जंघस्थि-स्थानच्युति होने के पश्चात् होने वाला जानु संधि-ग्रह।

Bed/Fracture Bed

भग्नास्थि-रोग-शय्या/कपाटशयन।

Bed-Pan

शय्यामलपात्र
शय्या मल-पात्र जो प्लास्टिक या धातु के बने होते हैं। इनका इस्तेमाल उन रोगियों के लिये होता है जो बिस्तर से उठ नहीं सकते हैं जैसे अर्धपत्राघात रोगी (Hemiplegic patients) दोनों पैरों में अस्थिभंग युक्त रोगी (Fracture of both the lower limb) आदि।

Bedsore

श्य्या-व्रण
एक ही स्थिति में दीर्घकाल तक पड़े रहने के कारण होने वाला व्रण। जो मरीज लगातार खाट पर पड़े रहते हैं, उनकी उन जगहों में, जिन पर पड़े रहने से बराबर दबाव पड़ता रहता है, व्रण बन जाता है। अक्सर यह व्रण त्रिक (कमर का पीछे का हिस्सा) नितम्ब (चूतड़ का भाग) तथा ऐड़ी पर बनता है। आमतौर पर इन व्रणों का कारण पुरानी कमजोर कर देने वाली बीमारियां (deblitating diseases) और तंत्रिका विकार (nervous disorders) हैं। इलाज की सबसे खास बात व्रण की रोकथाम है जो कारण को दूर करके की जा सकती है। इसके अलावा बार बार मरीज की स्थिति को बदलना अर्थात् करवट दिला देना तथा खाल (त्वचा) की देखभाल भी बहुत जरूरी है। मरीज को बहुत देर तक एक ही करवट लेटे रहने देना नहीं चाहिये। उसको थोड़ी देर बाद करवट बदलवा देनी चाहिये। साथ में पाउडर और स्पिरिट की मालिश कर देने से भी खाल की रक्षा हो जाती है और व्रण नहीं बन पाता।

Belemoid (Styliod Process)

शंकु-आहार
अन्तः प्रकोष्ठास्थि के शंकु-आहार के सदृश।

Bell’S Palsy

वेल्स अर्दित
चेहरे के पार्श्व में होने वाला घात (Paralysis) जो आनन तंत्रिका (Facial Nerve) को प्रभावित करता है। इस घात के अधिकांश मामलों में कारण अज्ञात (idiopathic) रहता है किंतु हरपीज सिंपलेक्स टाइप एक (Herpes simplex type-1) नामक विषाणुओं को अंतःतंत्रिका द्रव (endoneurial fluid) व पश्च कर्ण मांसपेशियों (post auricular muscle) में पाया गया है। अन्य कारण हैं इस तंत्रिका में किसी भी वजह से चोट (trauma) किसी अर्बुद के कारण तंत्रिका में दबाव। पूरी तंत्रिका या इसकी शाखायें प्रभावित हो सकती हैं। यह दशा साधारणतः एक पार्श्वीय (unilateral) होती है। यह दशा अचानक उत्पन्न होती है और अड़तालीस (48) घंटों के अंदर अधिकतम कमजोरी आ जाती है। इस कमजोरी के आने के एक या दो दिन पहले कानों के पीछे दर्द हो सकता है। स्वाद (tatse) लार (salivation) एक तरफ प्रभावित हो सकते हैं, इसके अलावा अतिकर्णता (Hyperacusis) भी हो सकती है। 80 फीसदी से ज्यादा रोगी कुछ सप्ताह या महीनों में पूर्णतया ठीक हो जाते हैं।

Bellocq’S Cannula

बेलोक केन्यूला/प्रवेशिनी नाड़ी।

Bell’S Palsy

बेलजात
मुख के किसी भी एक पार्श्व का एक प्रकार का घात जो आननतंत्रिका (फेशियल नर्ब) के घात के कारण होता है।

Benign Tumor

सूदम्य अर्वुद
अर्बुदों की तुलनात्मक रूप से कम खतरनाक (हानिकारक) किस्म। ये अर्बुद शरीर के किसी भी अंग या ऊतक प्रभावित कर सकते हैं किंतु ये प्रारंभ से अंत तक अपने स्थान पर ही बने रहते हैं अर्थात इनका फैलाव दूरस्थ अंगों (metastasis) में नहीं होता। ये शरीर पर अपना प्रभाव अन्य निकटस्थ अंगों या पैतृक अंग पर दबाव (compression or pressure) की वजह से डालते हैं। सामान्य लक्षण दबाव महसूस होना तथा संबंधित हिस्से में दर्द होना। कभी कभी ये अंग की क्रियात्मकता को भी प्रभावित कर देते हैं। उदाहरण के लिये गर्भाशय में होने वाले सुदम्य अर्बुद (fibromyoma) की वजह से महिलाओं में बांझपन (infertility) भी हो सकती है। इनका नामकरण संबंधित ऊत्तक के अंत में ओमा (oma) लगाकर किया जाता है उदाहरण फाइब्रोमा (Fibroma) लाइपा (Lipoma) न्यूरोमा (Neuroma) कान्ड्रोमा (Chondroma) एडीनोमा (adenoma) आदि। इनका उपचार सामान्य तौर पर शल्य कर्म द्वारा किया जाता है।

Bennett’S Fracture

बैनेट अस्थिभंग
इस अवस्था में पहली करम-अस्थि (first metacarpal bone) के आधार की तिरछी अस्थिभंग-च्युति (oblique fracture dislocation) होती है, जो निकटस्थ भाग तक फैलकर संधायक पृष्ठ (articular surface) को ग्रसित करती है। इसमें मणिबंध-करम-संधि (carpometacarpal joint) का जोड़ पूरी तरह अपनी जगह से नहीं खिसकता।

Bichat’S Fissure

बीचाट-विदार
मूलाधार में अनुप्रस्थ विदार।

Bicuspid Valve (Mitral Valve)

द्विपत्रकपाटिका
स्तनपायी जंतुओं (mammals including man) के में बायें अलिंद व निलयपट (atrioventricular septum) में उपस्थित छिद्र में स्थित कपाट जो दो वलनों की सहायता से बंद होता है। इस कपाट का मुख्य काम अलिंद से निलय में रक्त प्रवाह को निर्देशित करना तथा निलय के संकुचन (contractile phase) के दौरान रक्त को अलिंद में पुनः प्रवेशन को रोकना है। इस कपाट का खुलना व बंद होना एक विशेष हृदपेशी (papillary muscle) द्वारा नियंत्रित होता है। इस कपाट के सिंकुड़न (stenosis) से बायें अलिंद व फेफड़ों पर बुरा प्रभाव पड़ता है इसी प्रकार इसकी अकार्यत्मकता (regurgitation) से बायें निलय पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस कपाट की विकृतियों को शल्य कर्म द्वारा किया जा सकता है।

Bigelow’S Evacuator

बिजेलो उत्सारक
यह एक विशिष्ट सिरिंज है, जो मूत्राशय से रक्त-स्कंदों (blood clots) का उत्सारण मूत्र-मार्ग कैथीटर के द्वारा चुम्बकीय चुषण दाब (magnetic suction pressure) उत्पन्न करके करती है। इस सिरिंज का उपयोग मूत्राशय अश्मरीदलन (Litholapasey) के बाद पिच्चित पथरियों को मूत्राशय से बाहर निकालने में भी किया जा सकता है।

Bilabe

अश्मरी-निर्हरण-शलाका
अश्मरी-निर्हरणार्थ दीर्घ संकुचित शलाका।

Bile

पित्त
यकृत से निकलने वाला पीले हरे रंग का गाढ़ा क्षारीय स्राव, जो पित्त-वाहिनी से पित्ताशय तथा ग्रहणी (duodenum) में पहुँचता है और पाचन में सहायता करता है।

Biliary Colic

पैत्तिक शूल
इस अवस्था में दक्षिण अधः पर्शुक क्षेत्र (rt. hypochondrium) में रह रह कर पीड़ा (sporadic pain) होती है जो पीठ तथा दाहिने कन्धे की तरफ फैलती है। यह पीड़ा पित्ताश्मरी (biliary calculi) के कारण उत्पन्न होती है। यह पीड़ा कम या अधिक हो सकती है। इस रोग में शरीर का तापमान सामान्य रूप से सामानय होता है।

Biliary Calculus

पित्ताशय अश्मर
पित्ताश्मरी पित्तवाहिनी नलिकाओं या पित्ताशय (Biliary system or gall bladder) में पत्थरीकृत ऊत्तकों (bite stones) पाये जाने की विकृति। रासायनिक रूप से ये कोलेस्ट्रॉल पित्तवर्णक (bile pigments) या कैल्सियम के बने हो सकते हैं। अधिक कोलेस्ट्राल युक्त भोजन का सेवन करने वाले मनुष्यों तथा प्रौढ़ व स्थूलकाय महिलाओं के इस विकृति से प्रभावित होने की संभावना ज्यादा होती है। ये पित्त नलिकाओं को अवरोधित (obstruct) कर सकती है जिससे निम्न लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं पीलिया (Jaundice), सीने के दाहिने निचली ओर दर्द, उबकाई (Nausea), वमन (vomiting), अपच्यता (indigestion) आदि। निदान में संदेह होने या पत्थर की स्थिति का पता लगाने के लिये कोलैन्जियोग्राफी (Cholangiography) या अल्ट्रासाउंड की सहायता ली जा सकती ह। अल्ट्रासांउड (ultrasound) से पत्थर का आकार (size of stone) भी ज्ञात हो जाता है। कभी कभी ये पत्थर अपने आप (spontaneously) अवरोधित जगह से हटते हुये ग्रहणी तक चले जाते हैं किंतु अधिकांशतः इनके लिये शल्य कर्म की आवश्यकता पड़ती है। शल्यकर्म की गंभीरता व प्रकार पित्त संस्थान की दशा व पत्थरों की स्थिति व संख्या पर निर्भर करती है। आजकल खुले शल्यकर्म (open surgery) का इस्तेमाल कम हो रहा है। दूरबीन विधि से इलाज कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर ज्यादा कारगर होता है। दो प्रकार के दूरबीन शल्य-कर्म किये जाते हैं उदरीय (Laproscopic) व ई. आर. सी. पी. (Endoscupic retrograde cholangio pancreaticography) इनके अलावा पत्थरों को शरीर के बाहर से ध्वनि तरंगों को डालकर पित्त-नलिकाओं या पित्ताशय के अंदर ही तोड़ा जा सकता है इस विधि को लिथोट्रिप्सी (Lithotripsy) कहते हें।

Biliary Fistula

पैत्तिक नालव्रण
पित्त-पथ (biliary tract) तथा बाहरी वातावरण के बीच अथवा पित्त पथ तथा जठरांत्र परथ के बीच संचार (communication) का होना। पहली वाली अवस्था को बाह्य नालव्रण (external fistula) तथा बाद वाली अवस्था को आभ्यन्तर नालव्रण (एक रास्ते का बन जाना) का इलाज न किया जाय, तो पित्त की चिकित्सा कारण के अनुसार की जाती है।

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