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Definitional Dictionary of Surgical Terms (English-Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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Blood Shot

नेत्र रक्ताधिक्य
नेत्र में रक्त की अधिकता का होना।

Blood Shunting

पार्श्व-पथीय-रक्तसंचार
हृदयरोग की एक अवस्था, जिसमें रक्त फुक्फुस में न जाकर शुद्ध रक्त में मिश्रित हो जाता है।

Blood Smear

रक्तालेप
परीक्षणार्थ काँच पट्टिका पर रक्त का आलेप करना। रक्त की सूक्ष्मदर्शीय जांच के लिये कांच पट्टिका (Glass slide) पर रक्त का आलेप करना। इसके लिये रक्त की एक बूंद स्वच्छ व स्पष्ट (clean & transparant) कांच-पट्टिका में एक किनारे पर रखकर दूसरी कांच-पट्टिका के सिरे (end) की सहायता से समान मोटाई की परत (Homogenously thick layer) के रूप में फैला लेते हैं। इस आलेपन की सूक्ष्मदर्शीय स्पष्टता (Microscopic resolution) बढ़ाने के लिये इसको विशेष रसायनों की सहायता से रंजित (Stained) कर लेते हैं। ये रसायन रक्त के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग रंगों में रंग देते हैं जिससे रक्ताणुओं को पहचानना (identification) आसान हो जाता है। साधारणतः लीशमैन स्टेन (leishmans stain) का प्रयोग किया जाता है। रक्तालेपन का प्रयोग रक्ताणुओं से संबंधित विकृतियों का पता लगाने में किया जाता है। इन जांचों में प्रुख हैं-संपूर्ण श्वेताणु संख्या (Total leukocyte count TLC), विभिन्नता श्वेताणु संख्या (Differential leukocyte count DLC) लोहिताणु संख्या (RBC count) विबाणु संख्या (Platelet count) सभी रक्ताणुओं के आकार व प्रकार का अध्ययन (General blood Picture-GBP) रक्त के परिजीवियों को देखना (Parasites eg. Malarial Parasite) रक्त कैंसर (Blood-cancer) के लिये देखना आदि।

Blood Sugar

रक्तशर्करा, रक्त में उपस्थित शर्करा
रक्त शर्करा का साधारण अर्थ रक्त में ग्लूकोज की मात्रा से लिया जाता है। ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं के लिये वैश्विक ईंधन (universal fuel) की तरह काम करता है किंतु इसका स्रोत आहार नाल से अवशोषित भोजन है अतः अन्य पोषक पदार्थों की तरह यह भी रक्त-परिसंचरण की मदद से संपूर्ण शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाया जाता है। संपूर्ण शरीर की कोशिकाओं द्वारा इसका उपयोग होने के कारण इसकी तुरंत कमी होने की संभावना रहती है किंतु शरीर में इस प्रकार की व्यवस्था होती है कि उपापचयी अभिक्रियाओं (Interconverting metabolic procedures/reactions) की सहायता से अन्य शारीरिक रसायनों यथा प्रोटीन, ग्लाइकोजन व वसीय पदार्थों से ग्लूकोज का निर्माण (Gluconeogenesis) किया जा सकता है। इन अभिक्रियाओं का नियंत्रण विशेष अंतः स्रावी रसायनों (Endocrine Hormones) द्वारा होता है। यह नियंत्रण अत्यन्त दक्ष होने के बावजूद कभी-कभी अनियंत्रित हो जाता है। फलस्वरूप रक्त की शर्करा की मात्रा घट या बढ़ सकती है। रक्त शर्करा की अधिकता (Hyperglycemia) में कोशिकायें, इंसुलिन नामक अंतः स्रावी पदार्थ की कमी के कारण, रक्त शर्करा का उपयोग नही कर पाती। इस दशा को मधुमेह (Diabetes) कहते है तथा कोशिकायें ग्लूकोज के स्थान पर प्रोटीन या वसा का उपयोग ऊर्जा उत्पन्न करने के लिये करने लगती हैं फलस्वरूप शरीर का शिरा (wasting) होने लगती है तथा तरह-तरह के संक्रमण (infection) होने लगते हैं। रक्त शरकरा की कमी (Hypoglycemia) मुख्यतः भोजन की कमी या इंसुलिन की अधिकता से होती है। यह स्थिति अतिशर्करता की तुलना में ज्यादा खतरनाक है क्योंकि मस्तिष्क में शर्करा का कमी थोड़ी ही देर में घातक सिद्ध होती है। उच्चशर्करा का उपचार प्रेरक औषचियों (Oral hypoglycemic agents) की सहायता से इंसुलिन के स्रावण को बढ़ाकर या वाह्य इंसुलिन देकर किया जाता है। निम्न शर्करता का इलाज बाह्य शर्करा देकर किया जाता है।

Blood Transfusion

रक्ताधान
रक्ताल्पता में सूचीवेध द्वारा रक्त की आपूर्ति करना। किसी भी किस्म की रक्ताल्पता (anaemia or loss of blood) में रोगी को रक्त की आपूर्ति करना। रक्त का रक्त का रक्त से बेहतर विकल्प अब तक ज्ञात नहीं है। पूरे शरीर में पोषक पदार्थों, आक्सीजन व अन्य महत्वपूर्ण पदार्थों का फैलाव (Distribution) तथा उत्सर्जी पदार्थों का एकत्रीकरण रक्त के माध्यम से ही होता है। अतः रक्त का उचित मात्रा में होना, शरीर के सुचारु रूप से कार्य करने के लिये अतिआवश्यक है। कुछ परिस्थितियों व विकृतियों में रक्त की मात्रा या गुणों में कमी आ जाती है अतः रक्ताधान आवश्यक होता है। कुछ प्रमुख दशायें ये हैं- दुर्घटनाओं विशेषकर मोटरवाहन (Automobile accidents), गंभीर व विस्तुत शल्य कर्म, अतिरक्ताल्पता (Severe anaemia), हीमोफिलिया, तीव्र मलेरिया (Severe Malaria) आदि। रक्ताघान के लिये वाह्य रक्त की यथोचित जांच (Necessary examination) करवा ली जाती हैं तथा आवश्यक मात्रा की गणना कर ली जाती है।

Blood Urea

रक्त-यूरिया
1. रक्त में उपस्थित यूरिया।
2. प्रोटीन के अपचय से मलरूपी यूरिया का निर्माण होता है। यूरिया एक विषैला उत्सर्जी (excretory) पदार्थ है जिसका निर्माण प्रोटीन के अपचय (catabolism) से होता है। यह अपचय प्रमुखतः जिगर (Liver) में होता है। जिगर में बनने वाले यूरिया को रक्त में प्रवाहित कर किया जाता है। रक्त में उपस्थित यूरिया को गुर्दोद्वारा छानकर मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। स्पष्ट है शरीर में यूरिया की अधिकता (ureamia) दो प्रकार से हो सकती है पहला प्रोटीनों के अधिक विखंडन से, दूसरा उत्सर्जी तंत्र की विकृति से। साधारणतः दूसरा प्रकार ज्यादा पाया जाता है। उत्सर्जी तंत्र में विकृति किसी भी (Level) में हो सकती है उदाहरण गुर्दों में (Renal failure) मूत्र वाहिकाओं (urethra) मूत्राशय (Urinary bladder) या वाह्य मूत्र नलिका (urethra) में। यूरिया की अधिकता से रक्तगलन (Hemolysis) होने लगता है जिससे शरीर के अंदर ही रक्तस्राव (internal bleeding) होने लगती है समय पर उपचार न करने पर बेहोशी (uraemic coma) या मृत्यु भी हो सकती है। रक्त में यूरिया की सामान्य मात्रा 5-40mg/dl or 3.6-7. ommol/lit होती है (dl=deciiter=100ml, mmol-milli mol)*

Blood Vessels

रक्त वाहिकायें
रक्त-वहन करने वाली सिरा अथवा धमनी। संपूर्ण शरीर में रक्त को परिसंचरित करने वाली नलिकाये तीन प्रकार की होती हैं धमनियां (arteries), शिरायें (veins) तथा केशिकायें। हृदय से निकलकर पूरे शरीर में जाने वाली वाहिकाओं को धमनियां कहते हैं, इनमें ऑक्सीजनयुक्त रक्त प्रवाहित होता है किंतु हृदय से फेफड़ों में जाने वाली धमनियों (Pulmonary arteries) में ऑक्सीजन विहीन रक्त प्रवाहित होता है। इसी तरह पूरे शरीर से हृदय में आने वाली वाहिकाओं को शिरायें कहते हैं; फुफ्फुसीय शिराओं (Pulmonary veins) के अतिरिक्त सभी में आक्सीजनविहीन अशुद्धरक्त प्रवाहित होता है। धमनियों में रक्त दबाव ज्यादा होता है अतः धमनियों की दीवारें शिराओं की दीवारों से ज्यादा मोटी होती है। शिराओं और धमनियों के बीच के वाहिका जाल को केशिकीय जाल (Capillary network) कहते हैं। धमनियों तथा शिराओं दोनों की दीवारों में तीन परते होती है आंतरिक (Tunica interna or endothelium) , मध्य (Tunica media), व वाह्य (Tunica extrna) धमनियों में शिराओं की तुलना में मध्य-परत (Tunica-media) ज्यादा मोटी होती है। जिससे धमनियों की दीवार ज्यादा मोटी होती है, केशिकाओं में एक परत (Endothelium) होती है जो कि क्षितिज (Fenestrated) होती है, जिससे रक्त के छनने में आसानी होती है।

Blood Warmer

रक्त को उष्ण करने का यंत्र
यह दो प्रकार का हो सकता है चक्र रूप में (blood warming coil) या विद्युत उष्णक (Electric blood worm) पहले प्रकार में उष्णक एक चक्र रूपी (spiral or-coiled) नलिका की तरह होता है। इसे केवल एक बार इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे लगभग 990F (37.60C) उष्ण पानी में डुबो देते हैं और रुधिर आधान थैली में उपस्थित रक्त को इससे बहने देते हैं। इसमें रक्त प्रवाह नियंत्रण की व्यवस्था होती है। लंबे रक्ताधार (Prolonged transfusion) के दौरान इस यंत्र को हर चौबीस घंटे में बदल देना चाहिये। दूसरे प्रकार के उष्णक में एक कोष्ठक (receptacle) होता है जिसमें विद्युत उष्णक (electic heater) व एक बार प्रयोग किये जाने वाला रक्त उष्णक थैली (disposable blood warming bag) होता है इसके अलावा एक थर्मामीटर भी होता है। इसमें भी रकत को 990F (37.60C) पर उष्ण करते हैं।
दो रक्त उष्णकों का प्रयोग उन दशाओं में किया जाता है जहां अत्यधिक रक्ताधान (Massive transfusion) की आवशयकता पड़ती है क्योंकि इन दशाओं में ठंडे रक्त का आधान करने से रोगी रक्ताघात (shock) की अवस्था में जा सकता है।

Boil

फुन्सी
इस बीमारी में रोम-कूप (hair follicle) में तीव्र स्टेफ्लोकोकल संक्रमण हो जाता है, यानि बाल की जड़ में सूजन आ जाती है। जो लोग मधुमेह (Diabetes) बीमारी से पीड़ित हैं, उनके शरीर में अक्सर फुन्सियां निकल आया करती है। इस बीमारी में बाल की जडड में सख्त सूजन हो जाती है तथा छूने पर दर्द होता है। इसके इलाज में गरम सेक, दर्द को कम करने वाली दवाइयां, जीवाणुओं को मारने वाली दवाइयां (प्रतिजीवी औषधियां- (antibiotic) आ का सेवन किया जाता है। पूय पड़ जाने पर फुन्सी को चीर कर साफ कर दिया जाता है और जब तक ठीक नहीं होता; तब तक उसकी ड्रेसिंग करते रहते हैं।

Bone

(अस्थि)
शरीर में उपस्थित दृढ़ उत्तक जिसमें पेशियां संलग्न होती हैं तथा जो शरीर को एक ढांचा (Framework) प्रदान करता है। पेशियों के संलग्न होने के कारण यह ढांचा व शरीर, संतुलित रूप से गति कर सकता है। अस्थियां दृढ़ संयोजी-उत्तकों (hard connective-tissue) का एक प्रमुख प्रकार हैं। दूसरा प्रमुख प्रकार उपास्थि हैं। दोनों प्रकार के दृढ़ उत्तकों का निर्माण, भ्रूण के मध्य स्तर (Embryonic mesoderm) से होता है। दृढ़ता प्रदान करने के अतिरिक्त अस्थियां, कैल्सियम व फास्फेट के चयापचय (Metabolism) में भी योगदान देती है। शरीर के अलग-अलग भाग की अस्थियों की मजबूती व आकार अलग-अलग होती है। एक सामान्य युवा के शरीर में लगभग 206 अस्थियां होती हैं। ये सभी अस्थियां एक-दूसरे से संधियों (Joints) की सहायता से जुड़ी होती हैं। स्थिति के आधार पर शरीर की समस्त अस्थियों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है अक्षीय (axial) कंकाल बनाने वाली तथा उपांगीय कंकाल (appendicular skeleton eg. bones of limbs) बनाने वाली अस्थियां। आकार के आधार पर अस्थियों को तीन भागों में बांटा जा सकता है- लंबी (Long bones) चपटी (Flat bones) व अनियमित (irregular)। इसके उदाहरण निम्न हैं- लंबी-उपांगीय अस्थियां, चपटी-स्टर्नम व कपालीय (skull bones); अनियमित-केरुकाये (vertbral)।

Bone-Age

अस्थि-आयु
अस्थि की वास्तविक (chronological) आयु। अस्थियों का निर्माण उपास्थियों या त्वचा (Dermis) से होता है (chondral & dermal bones respectively)। दोनों ही दशाओं में अस्थि वृद्धि का एक केंद्र (Ossification center) अस्थिजनक उत्तक (ossifying tissue) में होता है। यह केंद्र तब तक सक्रिय रहता है जब तक कि अस्थि वृद्धि पूर्ण नहीं हो जाती। इस केंद्र की उत्पत्ति व विलोपन का समय लगभग निश्चित होता है। इसके अलावा अलग-अलग अस्थियों में यह केंद्र अलग-अलग समय पर उत्पन्न व विलोपित होता है। संबंधित अस्थि का एक्स-रे करने पर अस्थि-वृद्धि केंद्र का पता लगाया जा सकता है। पूर्ण वृद्धित (Mature) अस्थि तथा अस्थि वृद्धि-केंद्र दोनों ही एक्स-रे में किरण अपारदर्शक (radio-opaque) क्षेत्रों के रूप में आते हैं। जबकि अस्थिजनक उत्तक किरण पारदर्शक (radio-luscent) क्षेत्र के रूप में। एक्स- रे के माध्यम से अस्थि-वृद्धि केंद्रों की संख्याओं का भी पता लगाया जा सकता है। शरीर की सभी अस्थियों के अस्थि-वृद्धि केंद्र के उत्पन्न व विलोपन की एक मानक व प्रमाणिक सारणी उपलब्ध है जिससे तुलना करके किसी व्यक्ति की अस्थि-आयु और इस तरह उसकी शरीर-आयु का आंकलन किया जा सकता है। इस विधि का मुख्य इस्तेमाल फारेंसिक विज्ञान के क्षेत्र में किया जाता है।

Bone Cutting Forceps

अस्थि कर्तन सदंश
एक संदंश या फॉरसेप्स जिसका उपयोग अस्थियों के विभाजन में किया जाता है।

Bone-Cyst

अस्थिपुटी
अस्थियों में पायी जाने वाली पुटिया विकृति। यह एक कोष्ठीय (unilocular) या बहुकोष्ठीय (Multilocular) हो सकती है किंतु साधारणतः एक कोष्ठीय पुटियां ही पायी जाता है। सभी अस्थियों में से ये विकृतियां बाहुअस्थि (Humerus) में सर्वाधिक देखी गई है। इन विकृतियों का पता एक्स-रे के माध्यम से किया जा सकता है क्योंकि ये किरण-पारदर्शक (radio-luncent) होती हैं। अस्थियों में जिस जगह यह स्थित होती हैं वहां विकृतीय अस्थिभंग (Pathological fracture) होने की संभावना बहुत अधिक रहती है। अस्थिभंग होने की दशा में प्रभावित हिस्से को काटकर उसकी जगह हड्डी का एक नया टुकड़ा आरोपित (Bone-grafting) कर दी जाती है।

Bone Forceps

अस्थि संदंश
एक संदंश या फॉरसेप्स जिसका उपयोग अस्थि को पकड़ने में किया जाता है।

Bone Graft

अस्थि-निरोप
अस्थि का निरोपण या प्रत्यारोपण में प्रयुक्त अस्थि-रोप।

Bonelet

क्षुद्रास्थि
शरीर में स्थित क्षुद्र/लघु अस्थि।

Bone-Marrow

अस्थि-मज्जा
अस्थियों के बीच में तथा अस्थि सिरों (epiphysis) के छिद्रित भाग (cancellous bone) में पाये जाने वाला एक विशेषीकृत मुलायम उत्तक (Specialized soft-tissue) यह उत्तक रक्ताणुओं (Blood corpuscles) के निर्माण व वृद्धि (Manufacture & Maturation) के लिये अतिआवश्यक होता है। यह दो किस्म का होत है- पीली- मज्जा (yellow-marrow) जो कि वसीय (Fatty) होती है तथा युवाओं के सिरों पर स्थित क्षिद्रित अस्थि (cancellous bone of epiphysis) में पायी जाती है। लाल-मज्जा (Red-marrow) जो कि नवजात शिशुओं और बच्चों (infants & childrens) की कई अस्थियों में तथा युवाओं के अस्थियों के सिरों के स्पंजी भाग (spongy bone of the proximal epiphyses) में होती हैं- युवाओं में निम्न अस्थियों में लाल-मज्जा पायी जाती है- बाहुअस्थि (Humerus), जंधास्थि (Femmur), स्टर्नम पसलियों (Ribs) व कशेरुकायें (vertebrae)।

Bone-Marrow Transplant

रक्त-मज्जा प्रत्यारोपण
शरीर की सभी कोशिकाओं में पोषक पदर्थों को पहुंचाने के लिये तथा उनसे उत्सर्जी पदार्थों के ग्रहण के लिये रक्त अति आवश्यक है इस रक्त का निर्माण अस्थि-मज्जा में होता है। स्पष्ट है कि रक्त-संबंधी कुछ विकृतियों का कारण रक्त-मज्जा में अनियमितता हो सकती है। यदि इन विकृतियों को साधारण तरीके से ठीक नहीं किया जा सकता है तो रोगी की दशा क्रमशः गभीर होती जाती है, इन रोगियों में मज्जा-प्रतयारोपण करके उनके जीवन को बचाया या बढ़ाया जा सकता है। ऐसी कुछ दशायें हैं- अकोशिकीय रक्ताल्पता (aplastic anaemia) रक्त कैंसर (Leukemia), प्रतिरक्षा कमी (immuno deficiency syndromes), तीव्र किरण प्रभाविता (acute radiation syndrome)। इन दशाओं के उपचार के लिये योग्य दाता (Eligible bone-marrow donor) से मज्जा को सुई द्वारा खींचकर (by aspiration), रोगी के शरीर में अंतः शिरीय तरीके से (by intravenous route) प्रवेशित करा दिया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति मज्जा-दान नहीं कर सकता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का प्रतिरक्षा संघटन (Immunological composition) बिल्कुल अलग व विशिष्ट (Unique & specific) होता है तथा अपने से मिन्न कोशिका के संपर्क में आने पर वाह्य-कोशिका को नष्ट कर देता है। अतः मज्जा दान से पहले दाता का प्रतिरक्षा जांच (Immuno-typing) करवा कर ग्राहक (recepients) से मिलान (cross-matching) करवा लिया जाता है। आदर्श-मिलान (complete similarity) केवल समान – जुड़वां व्यक्तियों (identical-twins) में ही संभव है अतः साधारणतः अधिकतम मिलान की दशा में मज्जा का प्रत्यारोपण प्रतिरक्षा शामक औषधियों (Immune suppressant medicines eg. cortico steroids, Azathoiprine etc.) की उपस्थित में कर दिया जाता है। इन मरीजों की नियमित रूप से जांच (Regular follow-up) अति आवश्यक होती है।

Bony-Crepitus

अस्थि-करकर
(1) भंग या टूटी अस्थि के टुकड़ों के आपस में रगड़ने पर निकलने वाली ध्वनि। अस्थि-संबंधी-परीक्षण (orthopedic examination) बिना इस लक्षण को दर्शाने वाले तरीके को किये (Methods eliciting this sign) हुये अपूर्ण माना जाता है। उपचारित अस्थिभंग (treated fracture) में इस लक्षण का पाया जाना हड्डी के सिरों में जुड़ान के अभाव (delayed) को दर्शाता है।
(2) वृद्धावस्था संबंधी गठिया (osteoarthritis) में भी हड्डियों के जोड़ों के अंदर उपस्थित सिरों (articular ends of uniting bones) के बीच रगड़न उत्पनन हो जाती है इसका कारण संघीय द्रव (synovial fluids) की कमी होना है। गठिया में होने वाला दर्द इस भाग में स्वतंत्र तंत्रिका सिरों (Free-Nerve endings) के उत्तेजन (Stimulation) से होता है। अस्थि परीक्षण के दौरान संबंधित संधि के ऊपर एक हाथ को रखकर तथा दूसरे हाथ से अंग को चलाकर (on passively moving the part) उस संधि में इस लक्षण का पता लगाया जा सकता है।

Bougie

शलाका या बूजी
धातु या रबर (gum elastic) का बना एक यंतर, जो मूत्रभार्ग संकीर्णता (stricture of urethra) की चिकित्सा में मूत्रमार्ग के विस्फारण (dilatation) या चौड़ा करने में प्रयुक्त होता है। बूजी या शलाका कई आकार की होती है और इसको इंग्लिश (लिस्टर) या फ्रेंच (वलटन) मापनी (scales) में अंशाकित (graduated) किया जा सकता है। विशिष्ट प्रकार की बूजी, जैसे ऋजु शलाका या बूजी (straight bougie) शिश्न संकीर्णताओं (penile stricture) के लिये तथा सूत्रकार शलाका (filifrom bougie) अधिक तंग या अलंघय संकीर्णताओं (tight or impassable strictures) के लिये प्रयुक्त होती है।

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